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विज्ञान के नजरिए से विज्ञापनों की दुनिया

by Claude C Hopkins

10 chapters 41 min listen Hindi audio + text
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About this book

दो लफ्जों में

विज्ञान रोज इतनी तरक्की कर लेता है कि आज कही हुई बात कल पुरानी हो जाती है। लेकिन 100 साल पहले लिखी गई ये किताब और इसकी सलाह आज के दौर पर भी खरी उतरती है। शायद यही वजह है कि दुनिया का हर एड और मार्केटिंग गुरू इसे पढ़ने की सलाह जरूर देता है। हालांकि इसका नाम हैरान कर देता है। क्योंकि सवाल ये आता है कि एडवर्टाइजिंग में साइंस का क्या काम होगा? लेकिन जैसे जैसे आप इस किताब के पन्ने पलटते जाते हैं वैसे वैसे आपको इन सवालों के जवाब मिलते जाते हैं। 

 

ये किताब किनको पढ़नी चाहिए

• एडवर्टाइजिंग और मार्केटिंग से जुड़े लोग

• कॉमर्स और बिजनेस के स्टूडेंट्स 

• हर वो इंसान जो एडवर्टाइजिंग की दुनिया को समझना चाहता है

इस किताब को पढ़कर आप जानेंगे

• साइंटिफिक एडवर्टाइजिंग क्या है

• साउथ कोरिया में स्टार बक्स ने कैसे जगह बनाई

• मैगी से जुड़ा विवाद और मैगी की वापसी 

 

लेखक के बारे में

साल 1866 में अमेरिका में जन्मे Claude C Hopkins को अपने जमाने का एडवर्टाइजिंग जीनियस कहा जाता है। अपनी सर्विस की मदद से उन्होंने ढेरों कंपनियों को तरक्की की राह दिखाई। विज्ञापनों में जिंगल और स्लोगन की शुरुआत करने वालों में वो सबसे पहली गिनती में आते हैं। एडवर्टाइजिंग को लेकर उनकी समझ इतनी गहरी थी कि साल 1907 में उनको एड कंपनी से सालाना 185,000 डॉलर की तनख्वाह मिल रही थी। ये आज की तारीख में लगभग 6 लाख डॉलर  बनती है। अगर हम ये कहें कि उन्होंने ही विज्ञापनों को विज्ञान से जोड़ा तो कुछ गलत नहीं होगा। 

 

ये किताब आपको क्यों पढ़नी चाहिए? ताकि आप भी एडवर्टाइजिंग की कुछ गहराइयां समझ सकें।

बिजनेस या कॉमर्स उतना ही पुराना है जितना हमारा इतिहास। पहले तो लोग अपनी बनाई चीजें खुद ही इधर से उधर यात्रा करते हुए बेचा करते थे। आगे चलकर गाड़ियों और जहाजों की मदद से एक से दूसरे देश तक सामान भेजा जाने लगा। लेकिन इन सबके बीच में जो चीज बनी रही वो थी अपने बिजनेस को आगे ले जाने की चाह। लोगों की नजर में आप अपने मोहल्ले के सबसे अच्छे टेलर हो सकते हैं। अपने शहर के सबसे अच्छे इंग्लिश ट्यूटर भी हो सकते हैं। पर अपना हुनर या कहिए अपना प्रोडक्ट इससे बड़े दायरे तक पहुंचाना हो तो क्या किया जाए? यहां एडवर्टाइजिंग आपके काम आती है। और अब विज्ञापन, मार्केटिंग की बुनियाद बन चुके हैं। कंपनियां यूं ही विज्ञापनों पर लाखों खर्च नहीं करेंगी जब तक उनको करोड़ों का फायदा ना दिखे। आपकी जो भी उम्र हो बचपन से अब तक देखे हजारों विज्ञापनों में कुछ ना कुछ तो जबानी याद होंगे। ये विज्ञापन की ही ताकत थी जिसने एक वक्त पर डूबने लगे निरमा को सालों मार्केट लीडर बनाए रखा। विज्ञापन की मदद से UPS ने वो जगह वापस बनाई जो Fedex ने लगभग छीन ली थी। विज्ञापन में 'a diamond is forever' ना कहा गया होता तो ना तो कोई हीरों को पूछता और ना De Beers को। प्रॉक्टर एंड गैम्बल नाम की कंपनी अपने एड कैंपेन पर सालाना 100 मिलियन डॉलर से ज्यादा खर्च करती है। चलिए विज्ञापन किसी बिजनेस के लिए एक दमदार टूल है ये तो पता चल गया। पर ये ताकत आखिर कहां छिपी है? हम तो ये भी सुनते हैं ना कि फलाने विज्ञापन ने विवाद मचा दिया। तो वहां किस तरह की गल्ती हो जाती है? कुछ सेकंड का विज्ञापन आखिर किस तरह कंपनियों और प्रोडक्ट्स की तकदीर बदलता है और इस किताब में एडवर्टाइजिंग के साथ साइंटिफिक शब्द जोड़ने की क्या वजह रही ये सब हम इस किताब से सीखते हैं।

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