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Leisure

The Basis of Culture

by Josef Pieper

6 chapters 12 min listen Hindi audio + text
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About this book

दो लफ्जों में

चाहे स्टूडेंट्स हों, कामकाजी लोग या फिर घर संभालने वाले सब लगभग एक फिक्स रूटीन पर काम करते हैं। लेकिन जब कभी फुर्सत या छुट्टी जैसा शब्द कानों में गूंजता है तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहता। चाहे लंबी छुट्टी पर जाकर लंबा ब्रेक लेना हो या दिन का एक छोटा हिस्सा आराम करने को मिल जाए ऐसा लगता है जैसे कोई खजाना हाथ लग गया हो। पर क्या समाज में हमेशा से इन शब्दों की यही जगह या महत्व था? साल 1952 में आई ये किताब आपको उस दौर में ले जाती है जब आराम, फुर्सत या छुट्टी जैसे शब्दों ने समाज में एक बड़ी भूमिका निभाई जिससे पूजा पाठ, सोच विचार और चिंतन के लिए जगह बनी। दो वर्ल्ड वॉर के बाद की दुनिया में एक ऐसी सोच उभरी जो लोगों को बिना आराम दिए लगातार काम कराते रहने को सही ठहराकर उनका शोषण करने लगी। इस वजह से आज आराम करना आलस की निशानी माना जाता है। लेकिन मामूली सा लगने वाला ये शब्द इतने मायने रखता है कि हमें हर हाल में इसे अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाए रखना चाहिए। हमारी जिंदगी में आराम शामिल होना ही चाहिए। 

 

ये किताब किनको पढ़नी चाहिए?

• जो लोग वर्क-लाइफ बैलेंस का फेवर करते हैं

• वर्ल्ड वॉर के बाद के समाज में रुचि रखने वाले स्टूडेंट्स 

• जो लोग समाज में leisure, intellectual pursuit और labor के इतिहास को जानना चाहते हैं 

 

लेखक के बारे में

जोसेफ पीपर एक जर्मन दार्शनिक थे जिन्होंने एक्विनास और प्लेटो के काम की स्टडी की थी। वो मुन्स्टर यूनिवर्सिटी में philosophical anthropology के प्रोफेसर भी थे।

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