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Farmageddon

सस्ते मीट का महंगा सौदा

by Philip Lymbery with Isabel Oakeshott

14 chapters 28 min listen Hindi audio + text
Farmageddon
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About this book

दो लफ्जों में

मीट खाना चाहिए या नहीं इस पर हमेशा से बहस चलती आई है और शायद इस सवाल का कोई एक जवाब कभी मिल भी ना पाए। लेकिन मीट खाने वालों के पास इसकी अपनी वजह होती है। उनके लिए ये स्वाद और सेहत दोनों से भरपूर है। जैसे जैसे फार्म हाउस बढ़ते गए मीट प्रोडक्शन भी बढ़ा और अब पहले से कहीं सस्ते दाम पर मीट आसानी से मिलने लगा। लेकिन साल 2014 में आई ये किताब आपको बताती है कि सस्ती कीमत पर मिलने वाला मीट असल में हमें कितना महंगा पड़ता है। इंडस्ट्रियल फार्मिंग के चलन में आने पर डेयरी और मीट प्रोडक्शन के पुराने तरीके बंद होते गए। भले ही इन नई तकनीकों से मीट प्रोडक्शन काफी बढ़ गया पर हमारे रिसोर्स घटने लगे और एनवायरमेंट पर भी बुरा असर पड़ा। इतना ही नहीं सेहत के लिए बेहतर बताकर बेचा जाने वाला मीट हमें बीमार करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। 

 

ये किताब किनको पढ़नी चाहिए?

• जो लोग दुनिया में लगातार हो रही भोजन की कमी का हल निकालना चाहते हैं

• जो लोग मीट प्रोडक्शन के बारे में जानना चाहते हैं

• जो हेल्दी खानपान अपनाना चाहते हैं 

 

इस किताब को पढ़कर आप जानेंगे

• एक किलो बीफ के प्रोडक्शन में कितना पानी खर्च हो जाता है

• कैलीफोर्निया के ज्यादातर बच्चे अस्थमा का शिकार क्यों हैं

• इंडस्ट्रियल फार्मिंग का आल्टरनेटिव क्या है

 

लेखकों के बारे में

फिलिप लिम्ब्रे, एनिमल राइट्स के लिए काम करते हैं। वे 

Compassion in World Farming के CEO और

World Society for the Protection of Animals नाम की संस्था के लिए कम्युनिकेशन डायरेक्टर के तौर पर भी काम कर चुके हैं। इसाबेल, एक जर्नलिस्ट और राइटर हैं।

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